Friday, April 28, 2017

अब किसी भी प्रकार के टीवी डिबेट का बायकाॅट करेंगे मुस्लिम उलेमा

Posted by Unknown

"दारुल उलुम देवबंद का सराहनीय कदम"

दारुल उलुम देवबंद ने एक प्रेस नोट जारी कर मुस्लिम उलामाओं से मीडिया का पूरे तरीके से बायकाट करने की अपील की है, यह एक बेहद सराहनीय कदम है कयोंकि टीवी डिबेट में बैठे एंकर और नास्तिकता, फेमिनिज्म और लिब्रिज्म से लबरेज इंसान किसी भी उलामा को पुरी तरीके से अपनी बातों को सामने रखने नहीं देते हैं, जिससे वो इस्लाम की सही तस्वीर पेश नहीं कर पाते और लोगों के मन में इस्लाम के प्रति गलत धारणा पैदा होती है, इसके साथ-साथ उन मौलाना को भी रोका जा सकता है जो चंद पैसों के खातिर ऐसे डिबेट में शामिल होते हैं, लोगों को ये भी समझना होगा की इस्लाम को कुआन ओ अहादीस से जानना और समझना होगा नाकी टीवी डिबेट में उलेमाओं के दुसरी जानिब बैठे नास्तिकों से।

ऐसे टीवी डिबेट में आपको अक्सर ये लोग नजर आएंगे जो इस्लाम और इस्लामी कवानीन को गलत ढंग से पेश करते हैं।

तारिक़ फ़तेह:- इस शख्स का इस्लाम से कोई वास्ता नहीं। यह घोषित रुप से मानसिक रोगी या नास्तिक है जो की इस्लाम से खारिज ही कहलाएगा। अपने कारनामो की वजह से ये पाकिस्तान से भागकर कनाडा में रह रहा था, ना ये अपने मुल्क का हुआ और न उन मुल्कों का जिन्होंने इसे आसरा दिया, ये इंडियन मीडिया का चहेता मुस्लिम चेहरा है। तारिक फ़तेह जो कि पाकिस्तानी है और वह पाकिस्तान से अपनी रंजिश की वजह से मुसलमानों और पाकिस्तान को गालियां देता है इस लिये वह भारतीय फासिस्ट मीडिया का फ़ेवोरेट चेहरा है। यह शख्स हज़रत उमर र.अ से लेकर अम्मी आएशा र.अ की शान में गुस्ताखी कर चुका है।

सलमान रुश्दी:- इसकी अय्याशीओ को दुनिया जानती है और उसकी इस्लाम पे की गई गुस्ताख़िओ की वजह से उसको महरूम हज़रत अयातुल्लाह खुमैनी ने मौत का फतवा सुनाया था, यह शख्स भी इंडियन मीडिया का हीरो रहा है।

तस्लीमा नसरीन:– जिसको बांग्लादेश से निकाल दिया गया और जो मर्दो को अपनी किताबो में कुत्त* और अपनी ज़िन्दिगी में सिर्फ सेक्स करने की चीज़ मानती है, जिसकी लिखी गई किताबें अपनी अश्लीलता की वजह से जानी जाती है और इन्ही वजहों से उसको इस्लाम से खारिज किया जा चूका है, यह औरत मुसलमानों और इस्लाम मज़हब को गलियां देने का कोई मौका नही छोड़ती है, जिसकी वजह से यह इंडियन मीडिया की चहिती बनी रही है।

ऐसे ही कई चेहरे रहे हैं जो टीवी चैनलों पर इस्लाम और शरियत पर छींटाकसी करते नजर आते हैं और एंकर की शातिराना चाल से सामने बैठे उलेमाओं को बोलने का मौका नहीं दिया जाता है, इसलिए खैर मकदम किजिए दारुल उलुम के इस फैसले का जिसके बाद टीवी चैनलों का वो धंधा चौपट हो सकता है जो उन्होंने इस्लाम को बदनाम करके खड़ा किया है।

अशरफ हुसैन

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