जिस किसी ने ज़मीन के बटवारे को रोकना चाहा था उसे या तो क़ैद मिली या गोली।एक भीड़ थी जो महात्मा को मार देना चाह रही थी तो एक भीड़ दूसरे महात्मा की खाल ज़ंज़ीरो से खीच लेना चाह रही थी।मैं आज यह क्यों लिख रहा हूँ ताकि तुम देखो की भेड़िये कैसे होते हैं।
खान अब्दुल गफ़्फ़ार खान को जब महात्मा गाँधी ने पाकिस्तान भेजा तब वोह दर्द के साथ बोले गाँधी जी आपने मुझे भेड़ियों के हवाले कर दिया मगर खान बाबा इधर के भेड़िये नही देख पाए।उधर के भेड़ियों ने सरहदी गाँधी को जंज़ीरों से बाँध कर कैद कर दिया और इधर के एक भेड़ियों के झुँड ने महात्मा गाँधी को शहीद कर दिया।
मेरी नज़रों के सामने गाँधी और सरहदी गाँधी के बहुत से किस्से दौड़ रहे हैं।आज बादशाह खान की पुण्यतिथि है तो ठीक 10 दिन बाद महात्मा गाँधी की शहादत का दिन है।दोनों की मोहब्बत और एक दूसरे के साथ हद दर्जे तक खड़े रहने की मिसाल कम ही हैं।खान बाबा हम सबकी रौशनी हैं।भारत से बेहद मोहब्बत और अपनेपन ने उन्हें आज़ादी के बाद भी दशकों पाकिस्तानी जेल में रखा।हो सके तो आज ढूंढकर उनहे पढ़िए उनके ख़ुदाई खिदमतगार को महसूस कीजिये।बादशाह खान की इंसानियत की देखिये।उनकी तरफ नज़रें कीजिये,एक सौंधी सी खुशबू आएगी जिसमे अथाह सुकून होगा।

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